इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपहरण और दुष्कर्म के आरोपी को बरी किया
सं राजेंद्र जितेंद्र
- 14 Jan 2026, 10:19 PM
- Updated: 10:19 PM
प्रयागराज, 14 जनवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपहरण और दुष्कर्म के एक मामले में आरोपी को यह कहते हुए बरी कर दिया कि पीड़िता ने चिकित्सा परीक्षण के दौरान या न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए बयान में जबरन यौन उत्पीड़न का कोई जिक्र नहीं किया।
न्यायमूर्ति अचल सचदेव ने मंगलवार को दिए आदेश में कहा कि मुकदमे के दौरान मजिस्ट्रेट के समक्ष अपने बयान से मुकरना उसकी निष्ठा पर संदेह पैदा करता है और इसने अभियोजन का पक्ष कमजोर किया है।
अदालत ने दुष्कर्म के आरोपी भागवत कुशवाहा द्वारा दायर अपील स्वीकार करते हुए उसे आरोपों से मुक्त कर दिया।
कुशवाहा ने झांसी के विशेष न्यायाधीश (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण(पॉक्सो) द्वारा सितंबर 2019 में दिए गए निर्णय को चुनौती दी थी।
अधीनस्थ न्यायालय ने कुशवाहा को तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 366 (अपहरण) और 376 (दुष्कर्म) के तहत दोषी करार दिया था।
अधिकारियों के मुताबिक, लड़की के पिता ने 28 मई, 2015 को पुलिस में एक लिखित शिकायत दी थी और आरोप लगाया था कि उसकी बेटी का भागवत ने अपहरण कर लिया है।
पुलिस ने अगले ही दिन लड़की को बरामद कर लिया गया और उसका बयान दर्ज किया गया।
लड़की ने मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए अपने बयान में दुष्कर्म या अपहरण की कोई शिकायत नहीं की बल्कि उसने स्वीकार किया था कि वह भागवत से प्रेम करती है और अपनी इच्छा से उसके साथ गई थी लेकिन बाद में उसने अदालत में अपना बदल लिया और दावा किया कि आरोपी ने उसका अपहरण कर उससे दुष्कर्म किया।
उच्च न्यायालय ने कहा कि एक मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान से मुकरना गवाह की ईमानदारी पर संदेह पैदा करता है।
अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के तहत दिए गए बयान को “सारहीन आधार पर” त्यागा नहीं जा सकता।
उच्च न्यायालय ने यह भी पाया कि इससे पहले चिकित्सक को दिए बयान में भी लड़की ने बल प्रयोग का जिक्र नहीं किया और बस इतना ही कहा था कि वह अपीलकर्ता के साथ झांसी गई थी।
अदालत ने लड़की की कहानी को तार्किक रूप से भी कमजोर पाया।
लड़की ने दावा किया था कि रात में उसे जबरदस्ती ले जाया गया और उसने शोर मचाया लेकिन किसी ने उसकी आवाज नहीं सुनी, जबकि उसके माता पिता उसी मकान में सो रहे थे।
अदालत ने पाया कि इसकी अत्यधिक संभावना है कि अगर वास्तव में लड़की ने शोर मचाया होता तो उसके माता पिता सो नहीं रहे होते।
उच्च न्यायाल ने कहा कि अपीलकर्ता को केवल पीड़िता के बयान के आधार पर दोषी करार दिया गया जोकि पूरी तरह से विरोधाभासी है, यहां तक कि मेडिकल रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न या बाहरी चोट का कोई संकेत नहीं है।
भाषा सं राजेंद्र