प्राचीन भारत-ओमान समुद्री संबंधों को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से आईएनएसवी कौंडिन्य मस्कट पहुंचा
धीरज पवनेश
- 14 Jan 2026, 10:36 PM
- Updated: 10:36 PM
(तस्वीरों के साथ)
मस्कट, 14 जनवरी (भाषा) प्राचीन शैली में निर्मित जहाज आईएनएसवी कौंडिन्य गुजरात के तटीय शहर पोरबंदर से 17 दिनों में करीब 650 नॉटिकल मील की दूरी तय कर अपनी पहली समुद्री यात्रा के तहत बुधवार को मस्कट के तट पर पहुंचा। यह चुनौतीपूर्ण अभियान भारत और ओमान के बीच प्राचीन समुद्री संबंधों का प्रतीक है।
इस जहाज की कमान विकास शेरॉन संभाल रहे हैं। इस जहाज के चालक दल में चार अधिकारी और 13 नौसैनिक सवार हैं, जिनका यहां भव्य स्वागत किया गया। इस स्वागत समारोह में केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्वानंद सोनोवाल, मस्कट स्थित भारतीय दूतावास के वरिष्ठ अधिकारी, ओमान के विरासत और पर्यटन मंत्रालय के अधिकारी तथा ओमान की शाही नौसेना के अधिकारी भी मौजूद थे।
इस 65 फुट लंबे जहाज का निर्माण पारंपरिक तकनीकों का उपयोग करके किया गया है, जिसमें प्राकृतिक सामग्रियों और कई शताब्दियों पुरानी विधियों का प्रयोग किया गया है।
इस जहाज का निर्माण पांचवीं शताब्दी के एक पोत के आधार पर किया गया है, जिसकी तस्वीरें प्राचीन अजंता गुफाओं में मिली हैं।
इस जहाज का नाम पौराणिक नाविक कौंडिन्य के नाम पर रखा गया है, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने प्राचीन काल में भारत से दक्षिण पूर्व एशिया तक की यात्रा की थी। यह जहाज एक समुद्री राष्ट्र के रूप में भारत की ऐतिहासिक भूमिका का प्रतीक है।
मस्कट के सुल्तान काबूस बंदरगाह पर चालक दल का स्वागत करते हुए सोनोवाल ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘इस अभियान ने समुद्री क्षेत्र में भारत के इतिहास, विरासत और ताकत को याद दिलाया है। दल ने भारत को गौरवान्वित किया है और इस यात्रा ने ओमान के साथ हमारे सदियों पुराने संबंधों को भी मजबूत किया है... भारत-ओमान की मित्रता अमर रहे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ मस्कट में इस पोत का आगमन भारत-ओमान की उस अटूट मित्रता का प्रतीक है जो समय की कसौटी पर खरी उतरी है, इतिहास में निहित है, व्यापार से समृद्ध है और आपसी सम्मान से मजबूत हुई है।’’
इस अवसर पर ओमान के विरासत और पर्यटन मंत्रालय के अवर सचिव अज्जान बिन कासिम अल बुसैदी भी उपस्थित थे।
इस ऐतिहासिक जहाज पर सवार आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘यह (परियोजना) दर्शाती है कि प्राचीन भारत, जिस पर हमें बहुत गर्व है, वास्तव में जोखिम उठाने वाले, साहसी और व्यापारियों पर आधारित था, जिन्होंने नए बाजारों और नई भूमि की खोज की, संस्कृति का प्रसार किया, साथ ही उनसे नए विचार भी ग्रहण किए। हजारों साल पहले हिंद महासागर के इस विशाल क्षेत्र का अन्वेषण किया। इसलिए एक तरह से हम उन्हीं के पदचिह्नों पर चल रहे हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए, प्राचीन भारत जोखिम उठाने वालों का देश था और हम वास्तव में यहां उसी का जश्न मना रहे हैं।’’
इस ऐतिहासिक जहाज ने 29 दिसंबर को पोरबंदर से मस्कट के लिए अपनी पहली विदेश यात्रा शुरू की थी।
अभियान के प्रभारी अधिकारी कमांडर वाई हेमंत कुमार ने ‘पीटीआई-भाषा’से कहा,‘‘ कहा कि जब जहाज मस्कट के तट पर पहुंचा, तो उन्हें गर्व और खुशी का अनुभव हुआ, जो एक घटनापूर्ण यात्रा के समापन का प्रतीक था।’’
पोत के डिजाइन में आने वाली चुनौतियों के बारे में पूछे जाने पर कमांडर कुमार ने कहा कि यह परियोजना ‘‘बिल्कुल अलग तरह की’’ थी।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’से कहा, ‘‘जैसा कि आप जानते हैं, भारतीय नौसेना अत्याधुनिक युद्धपोतों का निर्माण कर रही है... विमानवाहक पोतों से लेकर पनडुब्बियों तक। लेकिन, यह बिल्कुल विपरीत स्थिति थी, जैसा कि पांचवीं शताब्दी की अजंता की चित्रकला (प्रेरणा का स्रोत)से पता चलता है।’’
कुमार ने कहा, ‘‘ध्यान रहे, यह सिर्फ एक चित्र है, एक कलात्मक कल्पना है। यह कोई माप वाला नक्शा भी नहीं है। इसलिए हमें उस चित्र से एक वास्तविक कार्यात्मक युद्धपोत का अनुमान लगाना पड़ा।’’
उन्होंने कहा कि यह एक बहुत बड़ी चुनौती थी। और इसे चलाना भी उतनी ही बड़ी चुनौतियों से भरा था।
नौसेना अधिकारी ने कहा, ‘‘ इस पोत में एक भी कील का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसे जोड़ने की तकनीक पूरी तरह से सिलाई तकनीक पर आधारित है, जिसे केरल के पारंपरिक कारीगरों ने तैयार किया है। इसलिए, जैसा कि आप देख सकते हैं, जहाज यहां सुरक्षित है और यह समुद्र के भार को सहन कर सकता है।’’
छात्रों सहित भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों ने इस पोत का स्वागत करने के लिए आयोजित कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया।
आधिकारिक स्वागत समारोह के दौरान पारंपरिक भारतीय और ओमानी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित की गईं।
नौसेना के एक प्रवक्ता ने ऐतिहासिक अभियान शुरू होने के मौके पर कहा था, ‘‘यह यात्रा उन प्राचीन समुद्री मार्गों का पुनः अनुसरण करती है, जो कभी भारत के पश्चिमी तट को ओमान से जोड़ते थे, जिससे हिंद महासागर के पार व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सतत सभ्यतागत संपर्क को बढ़ावा मिलता था।’’
संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और होडी इनोवेशन्स के बीच जुलाई 2023 में हस्ताक्षरित एक त्रिपक्षीय समझौते के माध्यम से प्राचीन तकनीक से यह जहाज बनाने की परियोजना शुरू की गई थी। परियोजना का वित्तपोषण संस्कृति मंत्रालय ने किया था।
भाषा धीरज