बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार यूनुस ने धार्मिक चरमपंथियों के साथ साठगांठ कर ली है : तस्लीमा
धीरज नरेश
- 09 Jan 2026, 06:31 PM
- Updated: 06:31 PM
(तस्वीरों के साथ)
तिरुवनंतपुरम, नौ जनवरी (भाषा) बांग्लादेशी-स्वीडिश लेखिका तस्लीमा नसरीन ने शुक्रवार को बांग्लादेश सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि उसके मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने देश में ‘‘धार्मिक चरमपंथियों और विभाजनकारी शक्तियों’’ के साथ साठगांठ कर ली है।
केरल विधानसभा अंतरराष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव (केएलआईबीएफ) के चौथे संस्करण में ‘शांति के लिए पुस्तक’ विषय पर आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए तस्लीमा ने आरोप लगाया कि नोबेल शांति पुरस्कार विजेता यूनुस ‘‘ऐसे एजेंडे को बढ़ावा दे रहे हैं जो धर्मनिरपेक्षता और आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए खतरा है।’’
उन्होंने कहा कि नोबेल शांति पुरस्कार शांति को परिभाषित नहीं करता, बल्कि सत्ता करती है और सत्ता को सच्चाई की परवाह बहुत कम होती है।
तस्लीमा ने कहा कि अमेरिका के 56वें विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला, लेकिन ‘‘उनकी नीतियों ने देशों को जलते हुए छोड़ दिया और उनकी रणनीतियों ने गांवों को तबाह कर दिया।’’
चर्चित उपन्यास ‘लज्जा’की लेखिका ने दावा किया कि इसी तरह नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और म्यांमा की पूर्व विदेश मंत्री आंग सान सू ची रोहिंग्या के साथ तब खड़ी नहीं हुईं जब उन्हें देश से निकाला जा रहा था। उन्होंने कहा, ‘‘उन्होंने मानवता के बजाय सत्ता को चुना।’’
तस्लीमा ने अपने वतन बांग्लादेश के बारे में कहा कि जब ‘‘कुछ धार्मिक कट्टरपंथियों और चरमपंथियों’’ ने उनकी किताबों की वजह से उन्हें जान से मारने की धमकी दी और उनके खिलाफ फतवे (धार्मिक फरमान) जारी किए, तब तत्कालीन बांग्लादेश सरकार ने ऐसे तत्वों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की और इसके बजाय उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।
उन्होंने कहा, ‘‘अगर सरकार ने उस समय कट्टरपंथियों और जिहादियों के खिलाफ कार्रवाई की होती, तो आज इस देश (बांग्लादेश) की हालत इतनी खराब नहीं होती। सरकार ने अपने राजनीतिक हितों के लिए और सत्ता में यथासंभव लंबे समय तक बने रहने के लिए धर्म का इस्तेमाल किया।’’
तस्लीमा ने बांग्लादेश सरकार पर धर्मनिरपेक्ष शिक्षण संस्थानों और विज्ञान अकादमियों की स्थापना के बजाय कट्टरपंथियों का समर्थन हासिल करने और ‘‘लंबे समय तक सत्ता में बने रहने’’ के लिए धार्मिक शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण करने का भी आरोप लगाया।
उन्होंने बांग्लादेश में मौजूदा संकट के लिए अंतरिम सरकार को दोषी ठहराते हुए कहा, ‘‘कट्टरपंथी एक तरह से सत्ता में हैं और डॉ. यूनुस उनका समर्थन कर रहे हैं। इसलिए, मुझे नहीं पता कि हम उस धर्मनिरपेक्ष देश को कैसे वापस पा सकेंगे जिसके लिए इसने 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।’’
तस्लीमा ने कहा, ‘‘अब देश विभाजित है और मुस्लिम चरमपंथी धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों की हत्या और उत्पीड़न कर रहे हैं जिसे रोकना होगा।’’
चर्चित लेखिका ने महोत्सव से इतर संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि बांग्लादेश के पूर्व शासनाध्यक्षों हुसैन मोहम्मद इरशाद, खालिदा जिया और शेख हसीना ने देश में धार्मिक चरमपंथ के उन्नयन को प्रोत्साहित किया।
उन्होंने कहा, ‘‘यह उनकी गलती है। उन्होंने बेवजह मस्जिदें और मदरसे बनवाए। ये जिहादियों की फैक्टियां हैं। अगर ये बढ़ते हैं, तो वे महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर हमला करते हैं। और यही अभी हो रहा है।’’
तस्लीमा ने दावा किया कि बांग्लादेश में हिंदुओं के लिए स्थिति ‘‘बहुत खराब’’ है। उन्होंने यूनुस पर हत्यारों, कट्टरपंथियों और जिहादियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया।
लेखिका ने उम्मीद जताई कि देश में अगला चुनाव ‘‘सच्चा’’ होगा और हालात तभी बदलेंगे जब कोई धर्मनिरपेक्षता समर्थक पार्टी सत्ता में आएगी।
हालांकि, उन्होंने इस बात पर चिंता जताई की कि बांग्लादेश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी, अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जबकि जमात-ए-इस्लामी मजबूत होती जा रही है।
तस्लीमा ने कहा, ‘‘अगर जमात-ए-इस्लामी सत्ता में आती है, तो वे संभवतः शरिया कानून लागू करेंगे जिससे महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।’’
जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत में मुसलमानों पर हो रहे कथित उत्पीड़न का असर बांग्लादेश पर पड़ रहा है, तो तस्लीमा ने इससे इनकार किया।
उन्होंने कहा, ‘‘नहीं, मुझे नहीं लगता कि बांग्लादेश में हुए नरसंहार से भारत का कोई संबंध है। हिंदुओं पर 1947 से ही अत्याचार हो रहा है। यह भारत में घटी घटनाओं की प्रतिक्रिया नहीं है। कुछ कट्टरपंथियों और जिहादियों में हमेशा से ही हिंदू-विरोधी मानसिकता रही है, और विभिन्न सरकारों के समर्थन से यह मानसिकता बढ़ती जा रही है।’’
तस्लीमा से जब पूछा गया कि क्या भारत में धर्मनिरपेक्षता खतरे में है, तो उन्होंने एक बार फिर इससे इनकार किया।
उन्होंने कहा, ‘‘भारत आज भी एक धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन बांग्लादेश, जो कभी धर्मनिरपेक्ष था, 1980 के दशक में इस्लाम को आधिकारिक धर्म बनाने वाला देश बन गया। जब आप किसी धर्म को राजकीय धर्म बना देते हैं, तो सभी गैर-मुस्लिम दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाते हैं। हम संविधान में धर्मनिरपेक्षता को वापस लाना चाहते हैं। यदि राजनीतिक दल राजनीतिक लाभ के लिए धर्म का उपयोग करते हैं, तो देश बर्बाद हो जाएगा।’’
तस्लीमा ने कहा कि जिस तरह ईरान में लोग इस्लामी शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं, उसी तरह बांग्लादेश को भी धार्मिक चरमपंथ का प्रतिरोध करना चाहिए।
लेखिका ने बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं की दुर्दशा को रेखांकित करते हुए कहा कि वहां बहुविवाह रोकने, तलाक की अनुमति देने या अपने पिता से विरासत प्राप्त करने की अनुमति देने वाले कानूनों की कमी है। उन्होंने समान नागरिक संहिता की मांग की।
भाषा धीरज