झारखंड सरकार ने पेसा अधिनियम की मूल भावना को कमजोर किया : भाजपा
रंजन रंजन सुरेश
- 05 Jan 2026, 12:35 AM
- Updated: 12:35 AM
रांची, चार जनवरी (भाषा) झारखंड में विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने रविवार को आरोप लगाया कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार ने पेसा अधिनियम 1996 की मूल भावना को कमजोर किया है, क्योंकि कानून में ‘ग्राम सभाओं’ की सटीक परिभाषा को अधिसूचित नियमों में ‘किनारे कर दिया गया है।’’
विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने हेमंत सोरेन सरकार पर ‘‘खनन माफिया और धर्मांतरण सिंडिकेट को फायदा पहुंचाने’’ के लिए पेसा अधिनियम की मूल भावना के साथ ‘छेड़छाड़’ करने का आरोप लगाया, जिसे सत्ताधारी झामुमो ने खारिज कर दिया।
भारतीय जनता पार्टी के नेता अर्जुन मुंडा ने कहा कि पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम में यह बताया गया है कि स्वशासी प्रणाली- जो प्राचीन काल से चले आ रहे पारंपरिक कानूनों, धार्मिक प्रथाओं और परंपराओं पर आधारित है- उसे ‘ग्राम सभा’ कहा जाएगा, जबकि झारखंड सरकार द्वारा अधिसूचित पेसा नियमों में ‘ग्राम सभाओं’ को परिभाषित करते समय केवल ‘परंपराओं’ का उल्लेख किया गया है।
झारखंड के मुख्यमंत्री रह चुके मुंडा ने यहां पत्रकारों से कहा, ‘‘प्रणाली को मजबूत और परिपक्व बनाने और अधिनियम को लागू करने के लिए नियम बनाए जाते हैं, लेकिन अधिसूचित पेसा नियमों में, 'ग्राम सभाओं' की सटीक परिभाषा को जानबूझकर और सोची-समझी साजिश के तहत किनारे कर दिया गया है।’’
उन्होंने कहा कि हर नियम की ‘अपनी परिभाषा या प्रस्तावना होती है जो विस्तार से बताती है कि इसके तहत क्या शामिल है।’’
उन्होंने दावा किया, ‘‘लेकिन जब कोई नए स्वीकृत पेसा नियमों को पढ़ता है, तो उसे पता चलेगा कि पेसा अधिनियम 1996 में निर्दिष्ट बिंदु अधिसूचित नियमों से गायब हैं।’’
भाजपा नेता ने कहा कि लगभग 10 ऐसे राज्य हैं जहां पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र हैं, जहां कानून के प्रावधानों के तहत पेसा नियम पहले ही लागू किए जा चुके हैं।
केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री रह चुके मुंडा ने कहा, ‘‘इनमें से अधिकतर राज्यों में, ‘ग्राम सभा’ को कानून की भावना के अनुरूप परिभाषित किया गया है।’’
उन्होंने दावा किया, हालांकि, झारखंड में पेसा नियमों की जांच करने पर, पता चलता है कि राज्य सरकार ने ‘ग्राम सभा’ और ग्राम शासन से संबंधित प्रावधानों से ‘कुछ मुख्य वाक्यांशों- जैसे पारंपरिक कानून, सामाजिक एवं धार्मिक प्रथाओं- को चालाकी से हटा दिया है।
मुंडा ने आगे कहा, ‘‘जब कानून की मूल भावना को इस तरह कमजोर किया जाता है, तो भविष्य में संभावित परिणामों की कल्पना आसानी से की जा सकती है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘मैंने पहले पेसा नियमों को अधिसूचत करने में हो रही देरी पर चिंता जताई थी। इसके अधिसूचित होने के बाद, इन नियमों को बनाने के पीछे सरकार की मंशा साफ हो गई।’’
उन्होंने दावा किया कि नए अधिसूचित नियम अब साफ तौर पर ‘‘राज्य सरकार के कानून के प्रावधानों को कमजोर करने और ऐसे वाक्यांश शामिल करने की मंशा दिखाते हैं जो आसानी से आदिवासियों को धोखा दे सकते हैं।’’
भाजपा नेता ने कहा, ‘‘प्रशासन इनकी अपने तरीके से व्याख्या करेगा, और संस्थान नियमों को अपने तरीके से देखेंगे।’’
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अगर राज्य सरकार कानून की मूल भावना के प्रति प्रतिबद्ध है, तो उसे कानून में बताए गए 'ग्राम सभा' से संबंधित प्रावधानों को अपने नियमों में साफ तौर पर शामिल करना चाहिए।
मरांडी ने भी यह आरोप लगाया कि हेमंत सोरेन सरकार ने पेसा को लागू करने के लिए जिस तरह से ‘इसकी मूल भावना के साथ छेड़छाड़ की है, वह साफ दिखाता है कि यह सब खनन माफिया और धर्मांतरण सिंडिकेट को फायदा पहुंचाने के मकसद से किया गया है’।
उन्होंने कहा कि ‘चोर चोरी से जाए, लेकिन हेराफेरी से नहीं’ - यह कहावत झारखंड में पेसा कानून के संदर्भ में बिल्कुल फिट बैठती है। आदिवासियों की भावनाओं के साथ खेलना झामुमो, कांग्रेस और राजद की प्रवृत्ति रही है।
मरांडी ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘झामुमो ने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर झारखंड आंदोलन की मूल भावना से समझौता किया, और अब, पेसा कानून में अव्यावहारिक प्रावधान जोड़कर, इसने एक बार फिर आदिवासी समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है।’’
उन्होंने लिखा, ‘‘शिबू सोरेन से लेकर हेमंत सोरेन तक, उन्होंने हमेशा सत्ता और राजनीतिक स्वार्थ के लिए आदिवासी हितों का बलिदान दिया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘भाजपा किसी भी हालत में आदिवासी समाज के साथ किए गए इस अन्याय और धोखे को बर्दाश्त नहीं करेगी।’’
झारखंड सरकार ने दो जनवरी को नियमों को अधिसूचित किया था, और पिछले साल 23 दिसंबर को कैबिनेट ने नियमों को मंजूरी दी थी।
इस बीच, प्रदेश में सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा की राज्यसभा सदस्य महुआ माझी ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मुंडा और मरांडी मुख्यमंत्री रह चुके हैं, लेकिन उन्होंने पेसा को लागू करने के लिए कुछ नहीं किया।
उन्होंने कहा, ‘‘राज्य में आदिवासी समाज ने जल, जंगल और जमीन पर अपने पारंपरिक अधिकारों को पाने के लिए सालों तक लड़ाई लड़ी। अब, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पेसा नियमों के जरिये उन्हें सशक्त बना रहे हैं। यह हमारी पार्टी और झामुमो के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि है और भारतीय जनता पार्टी इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही है- इसीलिए वे सवाल उठा रहे हैं।’’
माझी ने यह भी कहा कि अगर अधिसूचित नियमों में कोई अस्पष्टता है, तो भाजपा नेताओं को सिर्फ विरोध करने के बजाय उन्हें ठीक करने के लिए सुझाव देने चाहिए।
भाषा रंजन रंजन