ममता ने सीईसी से बंगाल में ‘मनमाने’ और ‘त्रुटिपूर्ण’ एसआईआर को रोकने का आग्रह किया
संतोष सुरेश
- 05 Jan 2026, 12:14 AM
- Updated: 12:14 AM
कोलकाता, चार जनवरी (भाषा) पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर राज्य में जारी मतदाता सूची के कथित ‘मनमाने’ और ‘त्रुटिपूर्ण’ विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को तुरंत रोकने का आग्रह किया और चेतावनी दी कि इससे बड़े पैमाने पर मतदाताओं के मताधिकार का हनन हो सकता है तथा भारतीय लोकतंत्र की नींव को ‘अपूरणीय क्षति’ पहुंच सकती है।
तीन जनवरी को लिखे एक कड़े पत्र में बनर्जी ने आयोग पर आरोप लगाया कि उसने एक ऐसी प्रक्रिया का संचालन किया है, जो ‘अनियोजित, अपर्याप्त तैयारी वाली और आनन-फानन में शुरू की गई’ है और जिसमें ‘गंभीर अनियमितताएं, प्रक्रियात्मक उल्लंघन और प्रशासनिक चूक’ शामिल है।
उन्होंने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) को लिखे गए उनके दो पूर्व पत्रों के बावजूद जमीनी स्थिति और बिगड़ गई है।
ममता ने लिखा, ‘‘मैं एक बार फिर आपको पत्र लिखकर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त करने के लिए विवश हूं।’’ ममता ने याद दिलाया कि उन्होंने 20 नवंबर और दो दिसंबर के पत्रों में भी इसी तरह के मुद्दे उठाए थे।
ममता ने निष्कर्ष निकाला कि जिस तरीके से इस समय एसआईआर किया जा रहा है वह भरोसेमंद नहीं है और यह लोकतंत्र की नींव पर चोट करता है।
मुख्यमंत्री ने लिखा, ‘‘कुल मिलाकर ये कमियां दर्शाती हैं कि वर्तमान में संचालित एसआईआर प्रक्रिया गंभीर रूप से दोषपूर्ण है और हमारे लोकतंत्र के मूलभूत ढांचे पर प्रहार करती है।’’
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि तत्काल सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो ‘अपरिर्वतनीय क्षति’ होगी और ‘बड़े पैमाने पर मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने’ की स्थिति से बचने के लिए इस प्रक्रिया को रोकना होगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि इस कार्य के लिए नियुक्त अधिकारियों को उचित या एकसमान प्रशिक्षण नहीं दिया गया था, जबकि उपयोग में लाए जा रहे आईटी प्रणाली ‘दोषपूर्ण, अस्थिर और अविश्वसनीय’ थी।
उन्होंने लिखा, ‘‘समय-समय पर जारी किए गए निर्देश असंगत और अक्सर विरोधाभासी होते हैं।’’ उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर स्पष्टता और योजना की कमी ने ‘इस महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया को एक मजाक बना दिया है’ और ‘चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता में जनता के विश्वास को गंभीर रूप से कमजोर किया है।’’
बनर्जी ने आयोग की तैयारियों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर भी निर्वाचन आयोग एसआईआर के ‘सटीक उद्देश्यों, तौर-तरीकों और अंतिम लक्ष्यों’ के बारे में अनिश्चित प्रतीत होता है।
उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि इस प्रक्रिया को समयबद्ध बताया जा रहा है, लेकिन इसमें कोई स्पष्ट, पारदर्शी या समान रूप से लागू होने वाली समयसीमा नहीं है।’’
उन्होंने बताया कि विभिन्न राज्य अलग-अलग मानदंडों का पालन कर रहे हैं, जिसके चलते समयसीमा में मनमाने ढंग से बदलाव किए जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने महत्वपूर्ण निर्देशों को जारी करने के ‘बेहद अनौपचारिक’ तरीके पर चिंता जताई।
उन्होंने लिखा, “महत्वपूर्ण निर्देश लगभग प्रतिदिन जारी किए जा रहे हैं, अक्सर व्हाट्सऐप संदेशों और टेक्स्ट संदेशों जैसे अनौपचारिक माध्यमों से।’’
उन्होंने यह भी कहा कि इतने संवैधानिक महत्व के कार्य के लिए कोई उचित लिखित अधिसूचना, परिपत्र या वैधानिक आदेश जारी नहीं किए जा रहे हैं।
बनर्जी ने चेतावनी दी कि इस तरह की अनौपचारिकता से ‘सटीकता, पारदर्शिता या जवाबदेही की कोई गुंजाइश नहीं बचती’ और इससे गंभीर अनियमितताओं (जिनमें वास्तविक मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने की संभावना भी शामिल है) का खतरा है।
मुख्यमंत्री ने गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया कि उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत वैधानिक प्राधिकारियों यानी मतदाता पंजीकरण अधिकारियों की जानकारी या अनुमोदन के बिना, सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) प्रणालियों के दुरुपयोग के माध्यम से मतदाताओं के नाम गुप्त रूप से हटाए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘इससे गंभीर सवाल उठते हैं कि ऐसे कार्यों को किसने अधिकृत किया है और किस कानूनी अधिकार के तहत ऐसा किया जा रहा है। ईसीआई को उसके पर्यवेक्षण या निर्देशन में किए गए किसी भी अवैध, मनमाने या पक्षपातपूर्ण कार्यों के लिए पूरी तरह से जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।’’
पत्र में ‘चयनात्मक और भेदभावपूर्ण दस्तावेजी प्रक्रियाओं’ पर भी प्रकाश डाला गया, जिसमें कहा गया कि बिहार में एसआईआर के दौरान वैध प्रमाण के रूप में स्वीकार किए गए परिवार रजिस्टर को अब पश्चिम बंगाल में बिना किसी औपचारिक अधिसूचना के अनौपचारिक संचार के माध्यम से कथित तौर पर अस्वीकार किया जा रहा है।
बनर्जी ने कहा, ‘‘इस तरह के चयनात्मक और अस्पष्ट बहिष्कार से भेदभाव और मनमानी की आशंकाएं पैदा होती हैं।’’ उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य अधिकारियों द्वारा जारी किए गए स्थायी निवास और अधिवास प्रमाण पत्रों को ‘अस्वीकार’ किया जा रहा है, जबकि प्रवासियों को कानूनी रूप से मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के योग्य रहने के बावजूद सुनवाई के लिए पेश होने को मजबूर किया जा रहा है।
निर्वाचन आयोग ने 16 दिसंबर को एसआईआर के पहले चरण के बाद मतदाता सूची का मसौदा प्रकाशित किया, जिसमें 58 लाख से अधिक नाम हटाए जाने के बाद मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ हो गई। दूसरा चरण (जो 27 दिसंबर से शुरू हुआ) में 1.67 करोड़ मतदाताओं की सुनवाई शामिल है, जिनकी जांच की जा रही है। इनमें से 1.36 करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड में तार्किक विसंगतियां पाई गई हैं और 31 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड का मिलान नहीं हो पाया है।
पश्चिम बंगाल के भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा, ‘‘सिर्फ टीएमसी और राज्य सरकार ही एसआईआर को लेकर इतना शोर मचा रही हैं। इससे सिर्फ यही साबित होता है कि एसआईआर फर्जी मतदाताओं को हटाने का अपना मकसद पूरा कर रहा है और इसी बात से टीएमसी नाराज है।’’
भाषा संतोष