बुद्ध के पवित्र अवशेष भारत की वंदनीय विरासत का अटूट हिस्सा हैं: मोदी
जोहेब नेत्रपाल
- 03 Jan 2026, 06:17 PM
- Updated: 06:17 PM
(फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, तीन जनवरी (भाषा) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को बुद्ध से जुड़ी वस्तुओं की एक प्रदर्शनी का उद्घाटन किया और कहा कि ये केवल वस्तुएं नहीं हैं बल्कि भारत की वंदनीय विरासत का अटूट हिस्सा हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि पवित्र पिपरहवा अवशेष वियतनाम, थाईलैंड और रूस समेत उन विभिन्न देशों की यात्रा कर चुके हैं जहां बौद्धों की आबादी अधिक है।
उन्होंने कहा कि इन देशों में आस्था और भक्ति की लहरें उठीं तथा लोग बड़ी संख्या में श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए पहुंचे।
प्रधानमंत्री ने कहा, “भगवान बुद्ध की यह साझा विरासत इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल राजनीति, कूटनीति और अर्थव्यवस्था के माध्यम से ही नहीं, बल्कि भावनाओं, आस्था और आध्यात्मिकता के गहरे बंधनों के माध्यम से भी जुड़ा हुआ है।”
मोदी दक्षिण दिल्ली के किला राय पिथोरा सांस्कृतिक परिसर में ‘लाइट एंड लोटस: रेलिक्स ऑफ द अवेकंड वंस’ नामक प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने याद दिलाया कि सरकार और गोदरेज समूह के हस्तक्षेप से ये पवित्र अवशेष 125 वर्षों से अधिक समय बाद भारत लाए गए हैं। मोदी ने कहा कि दोनों ने मिलकर पिछले साल मई में हांगकांग में इनकी नीलामी रोकी थी।
प्रधानमंत्री ने बौद्ध विद्वानों, राजनयिकों और अन्य अतिथियों की उपस्थिति में कहा, “भारत के लिए, बुद्ध के पवित्र अवशेष केवल अवशेष नहीं हैं, बल्कि हमारी वंदनीय विरासत व सभ्यता का एक अटूट हिस्सा हैं।”
मोदी ने कहा, ‘‘भारत न केवल भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों का संरक्षक है, बल्कि उनकी परंपरा का जीवंत वाहक भी है।’’
प्रधानमंत्री ने कहा कि उनका जन्मस्थान गुजरात का वडनगर बौद्ध अध्ययन का एक बहुत बड़ा केंद्र रहा है और वाराणसी के पास स्थित सारनाथ, जहां भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था, उनकी कर्मभूमि है।
मोदी संसद में वाराणसी लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं।
उन्होंने कहा कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार बनने से पहले, उन्होंने एक तीर्थयात्री के रूप में बौद्ध स्थलों की यात्रा की थी, और प्रधानमंत्री के रूप में, उन्हें दुनिया भर के बौद्ध तीर्थ केंद्रों का दौरा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
मोदी ने कहा कि नेपाल के लुम्बिनी, जापान के तो-जी मंदिर और किंकाकु-जी, चीन के शीआन में स्थित ‘जायंट वाइल्ड गूज पैगोडा’ तथा मंगोलिया के गांडन मठ की अपनी यात्राओं को याद किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि श्रीलंका के अनुराधापुरा में स्थित जया श्री महाबोधि की उनकी यात्रा सम्राट अशोक, भिक्षु महिंदा और संघमित्रा द्वारा स्थापित परंपरा से जुड़ने का एक अनुभव था।
उन्होंने कहा कि थाईलैंड के वाट फो और सिंगापुर के बुद्ध टूथ रेलिक मंदिर की यात्राओं ने भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के प्रभाव के बारे में उनकी समझ को और गहरा किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने बोधिवृक्ष के पौधे विश्व भर के बौद्ध तीर्थ स्थलों तक पहुंचाने का विशेष प्रयास किया।
उन्होंने कहा, ‘‘मानवता के लिए उस गहरे संदेश की कल्पना की जा सकती है जब परमाणु बम से तबाह हुए शहर हिरोशिमा के वनस्पति उद्यान में एक बोधि वृक्ष खड़ा होता है।’’
प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत है कि बौद्ध विरासत स्वाभाविक रूप से अगली पीढ़ियों तक पहुंचे।
उन्होंने कहा कि वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन और वैशाख एवं आषाढ़ पूर्णिमा जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन इसी विचार से प्रेरित हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने पाली भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया है ताकि बुद्ध द्वारा दिए गए उपदेश आम लोगों तक आसानी से पहुंच सकें।
उन्होंने कहा, “इससे धम्म को उसके मूल स्वरूप में समझना और समझाना आसान हो जाएगा और बौद्ध परंपरा से जुड़े शोध को भी मजबूती मिलेगी।”
पिपरहवा अवशेष प्रारंभिक बौद्ध धर्म के पुरातात्विक अध्ययन में केंद्रीय स्थान रखते हैं।
आधिकारिक बयान के अनुसार, ये अवशेष भगवान बुद्ध से सीधे जुड़े सबसे प्राचीन व ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हैं।
पुरातत्वीय साक्ष्यों के अनुसार, पिपरहवा स्थल प्राचीन कपिलवस्तु जुड़ा था, जिसे व्यापक रूप से उस स्थान के रूप में पहचाना जाता है जहां भगवान बुद्ध ने संन्यास लेने से पहले अपना प्रारंभिक जीवन व्यतीत किया था।
भाषा जोहेब