आदेश की प्रति का इंतजार किये बिना निर्णय देने पर उच्च न्यायालय ने नाराजगी जताई
सं राजेंद्र धीरज
- 02 Jan 2026, 10:26 PM
- Updated: 10:26 PM
प्रयागराज, दो जनवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले में विशेष अवकाश याचिका (एसएलपी) को लेकर उच्चतम न्यायालय के आदेश की प्रति का इंतजार किए बगैर आदेश पारित करने के लिए मेरठ की एक अदालत की आलोचना की है।
निचली अदालत के निर्णय पर टिप्पणी करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि मेरठ के अपर सत्र न्यायाधीश ने उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित निर्णय का परीक्षण करने के लिए मामले पर सुनवाई एक-दो दिन टाल दी होती तो कोई आसमान नहीं गिर जाता।
हामिद और दो अन्य की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र ने कहा कि वह निचली अदालत के इस रवैये को स्वीकार नहीं करते जिसने जरूरत से अधिक जल्दबाजी दिखाई। निचली अदालत ने 17 अगस्त, 2024 को एक आपराधिक मामले में याचिकाकर्ताओं को समन जारी किया था जिसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी।
निचली अदालत ने मेरठ में दर्ज एक मामले में मुकदमे का सामना करने के लिए इन याचिकाकर्ताओं को समन जारी किया था। यह मामला मई, 2020 में दो व्यक्तियों की हत्या से जुड़ा था।
जांच के बाद पुलिस ने हामिद और दो अन्य आरोपियो के नाम आरोप पत्र से हटा दिए थे। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने मुकदमे में इन तीन नामों को शामिल करने के लिए एक आवेदन दाखिल किया था जिसे निचली अदालत ने स्वीकार करते हुए समन जारी किया था।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि निचली अदालत ने जल्दबाजी में कार्य किया और यह जानते हुए कि इस आदेश के खिलाफ नौ अगस्त, 2024 को उच्चतम न्यायालय मे एक एसएलपी लंबित है, निचली अदालत ने 14 अगस्त, 2024 को आवेदन निस्तारित कर दिया, जबकि उसी दिन एसएलपी पर निर्णय दिया गया। हालांकि, उच्चतम न्यायालय का आदेश 17 अगस्त को वेबसाइट पर अपलोड किया गया।
सरकारी अधिवक्ता ने दलील दी कि यह दोहरी हत्या का मामला था और इन आरोपियों के नाम मुख्य मामले में उल्लिखित थे। स्वतंत्र गवाहों के बयान के आधार पर इन नामों को हटाना गलत था। इन आरोपियों ने गोली चलाई थी, इसलिए इन पर मुकदमा चलना चाहिए।
अदालत ने 18 पन्ने के अपने निर्णय में कहा कि पूर्व के आदेश में इस मामले में 30 दिनों में निर्णय देने का निर्देश दिया गया था, लेकिन उच्चतम न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करने के लिए एक-दो दिन की देरी से कोई नुकसान नहीं हो जाता।
अदालत ने 19 दिसंबर को दिए अपने निर्णय में नाखुशी जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह की जल्दबाजी अनुचित थी। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि अदालतों को ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे इस पवित्र संस्थान में लोगों की आस्था घटे।
भाषा सं राजेंद्र