दिल्ली: अदालत ने तेजाब हमला मामले में तीन आरोपियों को बरी किया, ‘गैर-पेशेवर’ जांच के लिए फटकार लगायी
गोला सुरेश
- 28 Dec 2025, 08:46 PM
- Updated: 08:46 PM
नयी दिल्ली, 28 दिसंबर (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने 2009 के तेजाब हमले के एक मामले में तीन लोगों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा है। अदालत ने पुलिस को ‘‘लापरवाह और गैर-पेशेवर’’ जांच करने के लिए कड़ी फटकार भी लगायी।
अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह जांच आरोपियों को बचाने के उद्देश्य से की गयी।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जगमोहन सिंह ने यशविंदर, बाला और मनदीप को बरी कर दिया। यह आदेश 24 दिसंबर को दिया गया, लेकिन इसकी प्रति रविवार को उपलब्ध हुई।
तीनों पर हरियाणा के पानीपत में एमबीए छात्रा शाहीन मलिक पर तेजाब हमला कराने के लिए एक नाबालिग के साथ आपराधिक साजिश रचने का आरोप था। नाबालिग को 17 दिसंबर 2015 को इस अपराध में दोषी ठहराया जा चुका है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा, ‘‘शुरुआत से ही जांच बेहद लापरवाह और गैर-पेशेवर तरीके से की गई, जिसमें यह संवेदनशीलता भी नहीं दिखाई गई कि यह तेजाब हमले का मामला है।’’
अदालत ने कहा, ‘‘जिस लापरवाही भरे ढंग से जांच की गई, उसे देखकर संदेह होता है कि कहीं यह जानबूझकर दोषियों को बचाने के इरादे से तो नहीं किया गया।’’
उसने कहा कि 19 नवंबर 2009 को हुई घटना के कई वर्षों बाद तक पुलिस ने आरोपियों की पहचान के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठाया और मार्च 2010 में ‘‘अनट्रेस रिपोर्ट’’ दाखिल कर दी। पीड़िता का बयान अक्टूबर 2013 में दर्ज किया गया।
‘अनट्रेस रिपोर्ट’ तब दाखिल की जाती है जब पुलिस किसी मामले की जांच के दौरान आरोपी का पता नहीं लगा पाती है।
न्यायाधीश ने जांच में गंभीर खामियों की ओर इशारा किया, जिनमें महत्वपूर्ण सबूतों जैसे पीड़िता का जला हुआ बैग और तेजाब फेंकने में इस्तेमाल किए गए गिलास को जमा न करना और फॉरेंसिक जांच के लिए न भेजना शामिल है।
अदालत ने कहा कि तेजाब की कथित खरीद की जांच, शिनाख्त परेड, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) जुटाने, आरोपियों के मोबाइल फोन जब्त करने या साजिश साबित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य एकत्र करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।
अदालत ने कहा कि पर्यवेक्षी पुलिस अधिकारियों ने भी बिना जांच-पड़ताल के ‘अनट्रेस रिपोर्ट’ और आरोपपत्र आगे बढ़ाकर अपने कर्तव्य में विफलता दिखाई।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इन खामियों को देखते हुए यह संदेह होता है कि जांच जानबूझकर अभियोजन के मामले को कमजोर करने के लिए की गई।’’
अदालत ने पानीपत के पुलिस अधीक्षक (एसपी) को जांच में हुई चूकों की जांच करने, दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने और 30 दिनों के भीतर उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया। एसपी को अनुपालन रिपोर्ट भी अदालत में दाखिल करने को कहा गया है।
अभियोजन के अनुसार, मलिक पर 2009 में उस समय तेजाब हमला किया गया जब वह पानीपत में यशविंदर के स्वामित्व वाले एक कॉलेज में स्टूडेंट काउंसलर के रूप में काम कर रही थी और साथ ही पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से एमबीए की पढ़ाई कर रही थी।
अभियोजन का दावा था कि यशविंदर ने कार्यस्थल पर उसका उत्पीड़न किया और उसकी पत्नी बाला ने विश्वविद्यालय के दो छात्रों मनदीप मान और एक नाबालिग के साथ मिलकर मलिक पर हमला कराने की साजिश रची।
यह मामला 2013 में पानीपत से दिल्ली की रोहिणी अदालत में स्थानांतरित किया गया।
अपने 53 पन्नों के आदेश में अदालत ने कहा कि उसे मलिक के प्रति ‘‘पूरी सहानुभूति” है, लेकिन उसके द्वारा जताए गए संदेह के अलावा कोई ऐसा ठोस सबूत नहीं है, जो कानूनी रूप से आरोप सिद्ध कर सके।
अदालत ने कहा, ‘‘अभियोजन आरोपियों के खिलाफ कोई भी आरोप संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है, इसलिए यशविंदर, बाला और मनदीप को सभी आरोपों से बरी किया जाता है।’’
बहरहाल, अदालत ने यह भी कहा कि तेजाब हमला एक जघन्य अपराध है।
उसने कहा, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि अभियोजिका तेजाब हमले की शिकार है। यह भी प्रमाणित है कि उसे इस हमले के कारण असहनीय पीड़ा झेलनी पड़ी, 18 सर्जरी करानी पड़ीं, एक आंख की रोशनी पूरी तरह चली गई और दूसरी आंख की रोशनी आंशिक रूप से ही लौट सकी।’’
अदालत ने कहा कि तेजाब हमले की पीड़िताओं को मानसिक आघातों और आत्मिक पीड़ा से जूझना पड़ता है।
यशविंदर के खिलाफ आरोपों पर अदालत ने कहा कि पीड़िता के बयान में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उसने यशविंदर के कथित व्यवहार की जानकारी उसकी पत्नी बाला को दी, जो पीड़िता के अनुसार, उसके कॉलेज में पढ़ा रही थी।
अदालत ने कहा कि परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि पीड़िता और यशविंदर के बीच नियोक्ता-कर्मचारी संबंध से आगे का भावनात्मक जुड़ाव था, जिससे बलात्कार के प्रयास के शिकायतकर्ता के आरोप पर भी उचित संदेह पैदा होता है।
बाला और मनदीप के खिलाफ भी साजिश साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला। अदालत ने कहा कि केवल संदेह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।
इससे पहले, पीड़िता के वकील मदीहा शाहजार ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा था कि इस फैसले को दिल्ली उच्च न्यायालय और जरूरत पड़ने पर उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जाएगी।
उच्चतम न्यायालय ने चार दिसंबर को इस मामले से जुड़ी एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए तेजाब हमले के मामलों में धीमी सुनवाई को ‘‘न्याय व्यवस्था का मजाक’’ बताया था और सभी उच्च न्यायालयों से चार सप्ताह में ऐसे लंबित मामलों का ब्योरा मांगा था।
भाषा
गोला