असम सरकार नेल्ली नरसंहार रिपोर्ट का राजनीतिकरण न करे, परिचर्चा में नागरिकों ने किया आग्रह
सुभाष नरेश
- 23 Nov 2025, 09:47 PM
- Updated: 09:47 PM
गुवाहाटी, 23 नवंबर (भाषा) असम सरकार 1983 के नेल्ली नरसंहार पर तिवारी आयोग की रिपोर्ट की प्रतियां इस सप्ताह के अंत में विधानसभा में प्रस्तुत करने की तैयारी में जुटी है, वहीं कई प्रतिष्ठित नागरिकों ने निष्कर्षों का राजनीतिकरण करने के खिलाफ रविवार को आगाह किया।
उन्होंने अधिकारियों से राज्य में अवैध प्रवास के मुद्दे का समाधान करने का भी आग्रह किया।
डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म 'द क्रॉसकरंट' द्वारा आयोजित एक परिचर्चा में शामिल हुए प्रतिष्ठित नागरिकों ने कहा कि रिपोर्ट में घटनाओं को सांप्रदायिक रंग नहीं दिया गया है, कई मामले छिटपुट प्रकृति के हैं।
'द क्रॉसकरंट' ने सूचना का अधिकार अधिनियम के माध्यम से रिपोर्ट प्राप्त की।
चौदह जुलाई 1983 को सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी टी.पी. तिवारी की अध्यक्षता में असम अशांति जांच आयोग का गठन उस वर्ष राज्य में हुई हिंसा की जांच के लिए किया गया था।
अंतिम रिपोर्ट मई 1984 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार को सौंपी गई, और इसके बाद असम गण परिषद (अगम) के नेतृत्व वाली सरकार ने इसे 1987 में विधानसभा में पेश किया था।
राज्य में भाजपा नीत सरकार, जिसमें अगप भी सहयोगी है, के हालिया कैबिनेट निर्णय में कहा गया कि आगामी सत्र के दौरान रिपोर्ट की कागजी और डिजिटल प्रति विधानसभा में वितरित की जाएगी।
हालांकि, मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने कहा है कि सदन इस रिपोर्ट पर चर्चा नहीं करेगा।
मंच द्वारा जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि रिपोर्ट में 1983 में राज्य में हुई 8,019 घटनाओं का उल्लेख है, जिनमें कुल 2,072 लोग मारे गए थे।
वर्ष 1983 की हिंसा में 2,26,951 लोग बेघर हो गए और 2,48,292 लोगों को राहत शिविरों में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा।
परिचर्चा में, अरुणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा ने कहा कि उस समय की सरकार को हिंसा की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग का गठन करना चाहिए था।
उन्होंने कहा कि जांच की ज़िम्मेदारी राज्य के बाहर के मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी को क्यों दी गई, यह आज भी एक सवाल बना हुआ है।
चर्चा में भाग लेते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शांतनु बारठाकुर ने कहा कि तिवारी आयोग की पृष्ठभूमि 'आव्रजन' है।
नेल्ली नरसंहार पर रिपोर्ट लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार बेदाब्रत लहकर ने कहा, ‘‘उस समय पूरी प्रशासनिक मशीनरी चुनाव कराने में व्यस्त थी।’’
उन्होंने दावा किया कि झड़पों का कोई एक निश्चित पैटर्न नहीं था, तथा प्रशासन हिंसा को रोकने में विफल रहा।
भाषा सुभाष