एनआईटी राउरकेला ने भू-मानचित्रण के लिए भारत की पहली ड्रोन प्रणाली का पेटेंट हासिल किया
यासिर अविनाश
- 20 Nov 2025, 08:57 PM
- Updated: 08:57 PM
नयी दिल्ली, 20 नवंबर (भाषा) ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी’ राउरकेला के शोधकर्ताओं ने ‘भू-मानचित्र’ के लिए एक स्वचालित ड्रोन प्रणाली का पेटेंट हासिल किया है। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
अधिकारियों ने बताया कि यह प्रणाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मानव रहित हवाई यान (यूएवी) तकनीक का इस्तेमाल कर खुद ही जमीन का नक्शा तैयार कर लेती है जबकि इसके लिए इंटरनेट या अन्य मानव मदद की जरूरत नहीं होती।
खेत, जंगल, पेड़-पौधे वाले इलाकों और शहरी क्षेत्रों की पहचान करने के मकसद से भूमि का नक्शा बनाना किसी भी देश में भौगोलिक प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है। यही नक्शे योजना बनाने, सड़क-बांध जैसी सुविधाएं विकसित करने, प्राकृतिक संसाधनों के सही उपयोग और पर्यावरण की निगरानी का आधार होते हैं।
भारत में जमीन का नक्शा अधिकतर मानव सर्वेक्षण के आधार पर तैयार किया जाता है जिससे इस कार्य में कई हफ्ते या महीने लग जाते हैं और नक्शा तैयार होने तक उस स्थान पर कुछ बदलाव भी हो सकता है।
वर्तमान में दूर के इलाकों की तस्वीरें लेने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है हालांकि, ली गई तस्वीरों को स्पष्ट देखने और समझने लायक नक्शा बनाने के लिए अब भी इस पर काम करने की जरूरत होती है, जिसमें समय लगता है।
कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर संबित बख्शी के अनुसार, हवाई तस्वीरों को समझने में मदद के लिए दुनिया भर में मॉडल तैयार किए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर विभिन्न चीजों के बीच सड़कों, इमारतों और पेड़-पौधों को पहचानने में उन्हें अक्सर मुश्किल होती है।
उन्होंने कहा कि ड्रोन केवल तस्वीरें एकत्र कर उन्हें विश्लेषण के लिए भेजते हैं, जबकि भू-मानचित्र ड्रोन अपने स्तर पर ही प्रक्रिया पूरी कर सकता है। इससे यह आत्मनिर्भर बनता है और दूर-दराज़, आपदा प्रभावित या ऐसे क्षेत्रों में जहां कोई संचार नेटवर्क नहीं है, विशेष रूप से उपयोगी है।
यह प्रणाली भारत सरकार द्वारा 2016 में शुरू किए गए ‘डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम’ (डीआईएलआरपीएम) में भी मदद कर सकता है और डीआईएलआरपीएम का मकसद सर्वेक्षण नक्शों को डिजिटल रूप में बदलकर एक आधुनिक और एकीकृत भूमि रिकॉर्ड तैयार करना है।
भाषा यासिर