देश-विदेश में काजू को प्रोत्साहन देने के लिए बोर्ड के गठन को केंद्र से संपर्क करेगा केसीएमए
राजेंद्र रवि कांत अजय
- 17 Nov 2025, 03:12 PM
- Updated: 03:12 PM
(राजेंद्र गुप्त)
मंगलुरु (कर्नाटक), 17 नवंबर (भाषा) कर्नाटक काजू विनिर्माता संघ (केसीएमए) देश-विदेश में काजू को प्रोत्साहित करने के लिए जल्द ही बैठक कर एक बोर्ड का खाका तैयार करेगा और इस संबंध में राज्य और केंद्र सरकार से संपर्क करेगा।
रविवार को यहां संपन्न तीन दिवसीय काजू शताब्दी शिखर सम्मेलन के दौरान केसीएमए के अध्यक्ष ए के राव ने पीटीआई भाषा को बताया, “जल्द ही केसीएमए के पदाधिकारी बैठक कर बोर्ड के स्वरूप पर चर्चा करेंगे और एक प्रस्ताव बनाकर सरकार से मिलेंगे।”
उन्होंने कहा, “इस बोर्ड के लिए केवल सरकार से ही नहीं, बल्कि काजू उद्योग से जुड़े सभी भागीदारों के सहयोग की जरूरत है। हालांकि, बिना सरकार के सहयोग के हम कुछ नहीं कर सकते। काजू उद्योग को बढ़ावा देने की लिए बोर्ड आज के समय की जरूरत है।”
भारत में विदेशी फल और मेवे को प्रोत्साहन देने वाली कंपनी एसएस एसोसिएट्स के सुमित सरन ने कहा कि काजू को बढ़ावा देने के लिए एक स्वतंत्र बोर्ड आवश्यक है जो पेशेवर ढंग से काम करे। बोर्ड की पहली जिम्मेदारी संसाधन एकत्रित करने की होगी।
उन्होंने कहा, “जितने भी अंतरराष्ट्रीय बोर्ड हैं उनमें संसाधन एकत्रित करने में वहां का उद्योग योगदान करता है। इसके बाद, वहां की सरकार उसमें योगदान करती है। यही वजह है कि भारत में कैलिफोर्निया और ऑस्ट्रेलिया का बादाम अच्छी पैठ बना चुका है।”
सरन ने कहा, “विदेश में जो भी प्रोत्साहन बोर्ड हैं वे निजी विशेषज्ञ एजेंसियों की सेवाएं लेते हैं जिससे परिणाम भी अच्छे आते हैं। चिली का अखरोट पूरी दुनिया में सबसे प्रसिद्ध अखरोट है। आज भारत में अखरोट के बाजार में अकेले चिली के अखरोट की हिस्सेदारी करीब 60 प्रतिशत पहुंच गई है।”
उन्होंने कहा कि दिलचस्प है कि चिली का अखरोट उद्योग महज 25 साल पुराना है और प्रोत्साहन के बल पर आज पूरी दुनिया में छा गया है। इसी तरह, कैलिफोर्निया का पिस्ता और बादाम। इन सभी को इनके बोर्ड ने पूरी दुनिया में प्रोत्साहित किया है। पिछले पांच-सात साल में भारत में पिस्ता की खपत 9,000 टन से 50,000 मीट्रिक टन पहुंच गई।”
वहीं केसीएमए के अध्यक्ष एके राव ने बताया कि 1955 में भारत के काजू उद्योग में कर्नाटक काजू उद्योग की हिस्सेदारी महज तीन प्रतिशत थी जो अब बढ़कर 20 प्रतिशत से अधिक हो गई है।
भाषा राजेंद्र रवि कांत