एससीबीए ने चुनावी बॉण्ड फैसले पर राष्ट्रपति को पत्र लिखने के लिए अपने प्रमुख की निंदा की
प्रशांत अविनाश
- 13 Mar 2024, 05:51 PM
- Updated: 05:51 PM
नयी दिल्ली, 13 मार्च (भाषा) सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने अपने अध्यक्ष आदिश सी. अग्रवाल द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लिखे उनके उस पत्र में व्यक्त विचारों की निंदा की है जिसमें उनसे चुनावी बॉण्ड योजना मामले में शीर्ष अदालत के फैसले पर राष्ट्रपति संदर्भ लेने का आग्रह किया गया है।
अग्रवाल के विचारों से खुद को अलग करते हुए बार निकाय की कार्यकारी समिति ने 12 मार्च को जारी अपने प्रस्ताव में यह स्पष्ट कर दिया कि समिति के सदस्यों ने न तो एससीबीए अध्यक्ष को पत्र लिखने के लिए अधिकृत किया और न ही पत्र में व्यक्त विचारों का समर्थन किया है।
सचिव रोहित पांडे द्वारा जारी एससीबीए प्रस्ताव में कहा गया है, “सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की कार्यकारी समिति के लिए यह स्पष्ट करना वाजिब हो गया है कि समिति के सदस्यों ने न तो अध्यक्ष (अग्रवाल) को ऐसा कोई पत्र लिखने के लिए अधिकृत किया है और न ही वे पत्र में व्यक्त किए गए उनके विचारों से सहमत हैं।”
इसमें कहा गया है, “सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की कार्यकारी समिति इस कृत्य के साथ-साथ इसकी सामग्री को भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार को खत्म करने और कमजोर करने के प्रयास के रूप में देखती है और स्पष्ट रूप से इसकी निंदा करती है।”
प्रस्ताव में कहा गया है कि अग्रवाल का सात पन्नों का पत्र ऑल इंडिया बार एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में उनके द्वारा लिखा गया प्रतीत होता है।
एससीबीए के प्रस्ताव में कहा गया, “हालांकि, यह देखा गया है कि उक्त पत्र पर अपने हस्ताक्षर के नीचे उन्होंने अन्य बातों के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में अपने पद का उल्लेख किया है।”
यह प्रस्ताव तब जारी किया गया जब अग्रवाल ने राष्ट्रपति मुर्मू को पत्र लिखकर उनसे चुनावी बॉण्ड योजना संबंधी फैसले के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय से परामर्श लेने का आग्रह किया। उन्होंने पत्र में फैसले को तब तक अमल में न लाने को कहा जब तक न्यायालय इस मामले पर दोबारा सुनवाई नहीं कर लेता।
अग्रवाल ने राष्ट्रपति को लिखे अपने पत्र में कहा, ‘‘विभिन्न राजनीतिक दलों को चंदा देने वाले कॉरपोरेट घरानों के नामों का खुलासा होने से ये घराने उत्पीड़न की दृष्टि से संवेदनशील हो जाएंगे।’’
उन्होंने कहा कि यदि सभी संवेदनशील जानकारियों को जारी किया जाता है, और वह भी पूर्वव्यापी प्रभाव से तो इससे ‘अंतरराष्ट्रीय जगत में राष्ट्र की प्रतिष्ठा’ धूमिल होगी।
भाषा
प्रशांत