न्यायालय ने महिला वकीलों के लिए पोश अधिनियम लागू करने की याचिका पर केंद्र को दिया नोटिस
धीरज नरेश
- 29 Aug 2025, 03:26 PM
- Updated: 03:26 PM
नयी दिल्ली, 29 अगस्त (भाषा)उच्चतम न्यायालय ने राज्य बार काउंसिल या बार एसोसिएशन में नामांकित महिला वकीलों के लिए कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण)अधिनियम, 2013 के कार्यावन्यन का निर्देश देने का अनुरोध करने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए शुक्रवार को सहमति जताई।
कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण)अधिनियम, 2013 को आम बोलचाल की भाषा में पोश अधिनियम के नाम से जाना जाता है।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने इस याचिका पर केंद्र और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया।
पीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल किया कि संविधान के अनुच्छेद 32 (मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए अदालत जाने का अधिकार) के तहत उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ याचिका कैसे दायर की जा सकती है।
मुंबई उच्च न्यायालय ने सात जुलाई को एक फैसले में कहा था कि पोश अधिनियम केवल नियोक्ता-कर्मचारी संबंध में ही लागू होता है, इसलिए महिला वकील इसके दायरे में नहीं आतीं।
इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करने संबंधी प्रार्थना को अर्जी से हटाने पर सहमति व्यक्त की।
शीर्ष अदालत अधिवक्ता और लेखिका सीमा जोशी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें राज्य बार काउंसिल और बार एसोसिएशन में पंजीकृत महिला वकीलों के लिए पोश अधिनियम का क्रियान्वयन करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
अधिवक्ता ऋतिका वोहरा और नमन जोशी के माध्यम से दाखिल याचिका में महिला अधिवक्ताओं की शिकायतों की सुनवाई के लिए पोश अधिनियम के तहत आंतरिक समितियों का गठन/जारी रखने के निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में कहा गया है कि राज्य बार काउंसिल या बार एसोसिएशन पर पोश अधिनियम लागू करने के मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से भारत में महिला वकीलों को राज्यों में असमान संरक्षण का खतरा है, जो कानून के अधिदेश के विरुद्ध है।
याचिका में दलील दी गई,‘‘पोश अधिनियम की प्रस्तावना में ही कहा गया है कि यौन उत्पीड़न संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत मिले समानता के महिला के मौलिक अधिकारों, अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और सम्मान, तथा अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत किसी भी पेशे को करने की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है, जिसमें यौन उत्पीड़न से मुक्त सुरक्षित वातावरण का अधिकार भी शामिल है।’’
भाषा धीरज