शिक्षा समाज के निर्माण का मुख्य आधार, इसे नजरअंदाज न करें : रास में विपक्ष ने सरकार से कहा
मनीषा माधव
- 11 Mar 2025, 04:18 PM
- Updated: 04:18 PM
नयी दिल्ली, 11 मार्च (भाषा) राज्यसभा में मंगलवार को विभिन्न विपक्षी दलों के सदस्यों ने आरोप लगाया कि शिक्षा समाज के निर्माण का मुख्य आधार है लेकिन इसे सरकार द्वारा नजरअंदाज करने की वजह से यह आधार कभी मजबूत नहीं हो पाया और बच्चों का बीच में पढ़ाई छोड़ना, स्कूलों में शिक्षकों, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं अवसंरचना का अभाव तथा पर्चे लीक होना जैसी समस्याएं दूर होने के बजाय बढ़ती जा रही हैं।
उच्च सदन में शिक्षा मंत्रालय के कामकाज पर चर्चा में हिस्सा ले रहे विपक्षी सदस्यों ने सरकार पर विपक्ष शासित राज्यों के साथ ‘‘प्रतिकूल व्यवहार’’ करने का भी आरोप लगाया।
तृणमूल कांग्रेस के रीताव्रता बनर्जी ने कहा कि शिक्षा समाज के निर्माण का मुख्य आधार है लेकिन दुर्भाग्य से सबके लिए शिक्षा का लक्ष्य देश में आज तक पूरा नहीं हो पाया ।
उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आज भी चुनौती है और हमारे 80 फीसदी युवा बेरोजगार हैं। ‘‘असंगठित क्षेत्र में न सामाजिक सुरक्षा है और न ही निश्चितता, लेकिन युवा वहां विषम हालात में भी काम करने के लिए मजबूर हैं।’’
बनर्जी ने कहा कि राज्य विश्वविद्यालयों को अपनी जरूरतों के अनुसार काम करने की छूट दी जानी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता और राजनीतिक प्रतिशोध विपक्ष शासित राज्यों में हावी हो जाता है। उन्होंने कहा कि कुलपतियों की नियुक्ति में राज्य सरकार को उपेक्षित कर दिया जाता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार, विपक्ष शासित राज्य सरकारों को विभिन्न शिक्षा मदों की केंद्रीय राशि भी समय पर जारी नहीं करती और पश्चिम बंगाल इसका उदाहरण है। ‘‘हमारा समग्र शिक्षा का कोष बार बार अनुरोध के बावजूद आज तक जारी नहीं किया गया। यह सहकारी संघवाद की भावना का पूरी तरह से उल्लंघन है।’’
बनर्जी ने अल्पसंख्यक संस्थानों का जिक्र करते हुए कहा कि आज करीब 54000 संस्थान देश में ईसाई संगठनों द्वारा चलाए जाते हैं जिनमें सात लाख विद्यार्थी पढ़ते हैं जो हर वर्ग के हैं। ‘‘लेकिन ये संस्थान सरकार के निशाने पर रहते हैं।’’
उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी पाठ्यपुस्तकों में से गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर के पाठ को हटा दिया। ‘‘यह विडंबना है।’’
द्रमुक सदस्य डॉ एनवीएन कनिमोझी शोमू ने कहा कि आजादी से पहले भारत में शिक्षा व्यवस्था विकेंद्रीकृत थी और महिलाएं भी शिक्षा से वंचित थीं लेकिन आजादी के बाद शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए तमाम प्रयास किए गए और इसे समवर्ती सूची में रखा गया जिसमें केंद्र और राज्य सरकार को बराबर के अधिकार हैं।
उन्होंने कहा ‘‘तमिलनाडु ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रयास किए और इसे बढ़ावा देने के लिए कई बेहतर कदम उठाए। तमिलनाडु ने मध्याह्न भोजन योजना और शिक्षा का अधिकार कानून सबसे पहले लागू किया। यही वजह है कि हम साक्षरता को बढ़ाने और निरक्षरता को कम करने में बहुत हद तक कामयाब रहे। ’’
शोमू ने कहा कि लेकिन केंद्र की ओर से वह सहयोग नहीं मिला जो मिलना चाहिए था। ‘‘आज तीन भाषा के फार्मूले के नाम पर हमारे ऊपर हिंदी थोपी जा रही है। केंद्र ने उत्तर भारत के राज्यों के लोगों को तमिल या अन्य दक्षिण भारतीय भाषाएं सिखाने के लिए कोई संस्थान स्थापित क्यों नहीं किया?’’
उन्होंने कहा कि तमिलनाडु नयी शिक्षा नीति का विरोध कर रहा है क्योंकि केंद्र इसके माध्यम से हिंदी और संस्कृत थोपने की कोशिश कर रहा है। ‘‘तमिलनाडु की दो भाषा नीति में कोई बदलाव नहीं होगा। ’’
शोमू ने कहा कि सच्ची प्रगति नवाचार में निहित है न कि भाषा थोपने में। ’’कृत्रिम मेधा (एआई) के युग में स्कूलों में किसी भी भाषा को तीसरी भाषा के रूप में थोपना अनावश्यक है। हम अपनी दो भाषा की नीति पर कायम हैं और 1940 से तमिलनाडु हिंदी का विरोध करता आ रहा है। लेकिन इसे हम पर थोपा जा रहा है। यह न केवल हास्यास्पद है बल्कि असंवैधानिक भी है।’’
उन्होंने कहा ‘‘मैं स्पष्ट करना चाहती हूं कि हम किसी भी भाषा को सीखने के खिलाफ नहीं हैं बल्कि किसी भी भाषा के हम पर थोपे जाने के खिलाफ हैं, चाहे वह हिंदी ही क्यों न हो।’’
शोमू ने कहा कि अगर तमिलनाडु और तमिलों के आत्मसम्मान के साथ खिलवाड़ कर जबरन उन पर हिंदी भाषा न थोपी जाए तो उनकी पार्टी इस भाषा का विरोध नहीं करेगी।
आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने कहा ‘‘भारत तब ही विकसित बनेगा जब वह शिक्षित होगा। लेकिन शिक्षित भारत की सच्चाई सरकार के बड़े बड़े दावों से विपरीत है। 2022-23 और 2023-24 में पूरे देश में पहली से आठवीं कक्षा के 54,77,223 बच्चों ने सरकारी स्कूल की पढ़ाई छोड़ी है।’’
उन्होंने कहा कि बीते सात साल में 70 परीक्षाओं के पर्चे लीक हुए। ‘‘बेरोजगार युवा बड़ी उम्मीदों से तैयारी करता है लेकिन पर्चा लीक हो जाता है और उसकी उम्मीदों पर पानी फिर जाता है।
सिंह ने कहा कि ‘प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा प्रोत्साहन योजना’ के तहत 2023-24 में 98 करोड़ रुपये खर्च किए, इसके अगले साल योजना के लिए 1,558 करोड़ रुपये निर्धारित किए और फिर संशोधित बजट में इसे घटा कर 1000 करोड़ कर दिया गया। ‘‘इस तरह आपने अजा, अजजा, ओबीसी को मिलने वाली छात्रवृत्ति को ही कम कर दिया।’’
उन्होंने दावा किया कि और भी योजनाएं ऐसी हैं जिनमें सुनहरे सपने दिखा कर बजट घटा दिया गया। ‘‘पीएम श्री योजना, प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान इसके उदाहरण हैं। यहां तक कि मध्याह्न भोजन योजना का पैसा भी 19 फीसदी कम कर दिया गया।’’
उन्होंने सरकार पर शिक्षा व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया।
वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के गोला बाबू राव ने कहा कि शिक्षा को लेकर बड़े बड़े दावों की असलियत यही है कि आजादी के इतने साल बाद हम आज संसद में शिक्षा पर चर्चा कर रहे हैं और हमारे युवा बेरोजगार हैं।
उन्होंने कहा ‘‘कई स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, अगर हैं तो वहां अवसंरचना नहीं है, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही है, पर्चे लीक हो रहे हैं। यह सब क्या है? अगर अभी भी हम दलीय राजनीति से ऊपर उठ कर नहीं सोचेंगे तो यह चर्चा बेमानी होगी। विकसित भारत की कल्पना तो बहुत दूर की बात है। ’’
राव ने कहा कि पाठ्यक्रम बदलने से कुछ नहीं होगा और न ही विश्वविद्यालयों में पसंदीदा कुलपतियों की नियुक्ति से कुछ होगा। ‘‘शिक्षा को लेकर वास्तविक सुधार कुछ और हैं जो पूरे देश में करने होंगे।’’
राष्ट्रीय जनता दल के मनोज कुमार झा ने कहा ‘‘भाषाओं को लेकर खासा विवाद चल रहा है। ऐसे ही विवाद में पहले हम बहुत कुछ गंवा चुके हैं। भाषाएं लोक माध्यम से बढ़ती हैं सरकार के प्रयासों से नहीं। ’’
उन्होंने कहा ‘‘सदन में नयी शिक्षा नीति पर, इसे तैयार करते समय चर्चा होनी चाहिए थी जो नहीं हुई। इस नीति में कई विसंगतियां हैं। मातृ भाषा वाली बात अच्छी है कि पांचवी कक्षा तक इस भाषा में शिक्षा मिले। लेकिन अंग्रेजी को लेकर हमें अपना नजरिया साफ करना होगा।’’
झा ने कहा ‘‘उच्च शिक्षा के लिए नामांकन के संदर्भ में बिहार देश के तरजीही राज्य गुजरात की बराबरी करता है। यह अच्छी बात है।’’
उन्होंने कहा कि शिक्षा से उम्मीद को लेकर प्राथमिकता स्पष्ट होनी चाहिए। सार्वजनिक क्षेत्र के विद्यालयों की शिक्षा और निजी क्षेत्र की शिक्षा के बीच संतुलन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के विद्यालयों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और कोचिंग संस्थानों पर भी अंकुश लगाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बार बार पाठ्यक्रम में बदलाव किया जाता है और यही वजह है कि बच्चा आठवीं नौवीं कक्षा से ही एनटीए की कोचिंग लेने लगता है। ‘‘इसके लिए कौन जिम्मेदार है ?’’
झा ने आरोप लगाया कि अब शिक्षा संस्थान दक्षिणपंथी वैचारिक रुझानों का अड्डा बनते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा ‘यह सोचना होगा कि शिक्षा उद्योग कतई नहीं है, हां, इसमें निवेश जरूरी है ताकि इसे बढ़ावा दिया जा सके।’’
औरंगजेब को लेकर चल रहे विवाद का परोक्ष संदर्भ देते हुए झा ने कहा ‘‘इतिहास के बासी पन्नों में जा कर अगर हम आज की चुनौतियों को नजरअंदाज करेंगे तो इतिहास के बासी पन्नों के नायक किसी भी समस्या के हल में हमारी कोई मदद नहीं करेंगे।’’
भाषा
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