संविधान सभा में एक मुस्लिम सदस्य ने गोहत्या पर प्रतिबंध को मौलिक अधिकार के रूप में समर्थन दिया था
माधव
- 27 May 2026, 05:57 PM
- Updated: 05:57 PM
नयी दिल्ली, 27 मई (भाषा) मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों द्वारा गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग के बीच, संविधान सभा की बहसों पर एक नजर डालने से पता चलता है कि दो मुस्लिम सदस्यों ने गायों की हत्या पर राज्य के रुख को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने की मांग की थी, जिनमें से एक ने तो इसे मौलिक अधिकारों के हिस्से के रूप में प्रतिबंधित करने का भी आह्वान किया था।
सैयद मुहम्मद सादुल्ला ने कुरान के एक आदेश - 'ला इकराहा फिद दीन' का हवाला देते हुए कहा था कि धर्म के नाम पर कोई जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर संविधान निर्माता सीधे तौर पर कहते हैं कि गाय को धार्मिक आधार पर वध से बचाया जाना चाहिए, तो वह उनके काम में बाधा नहीं डालना चाहते।
उन्होंने हालांकि कहा कि अगर इसके पीछे आर्थिक कारण बताए गए तो वह गाय संरक्षण से संबंधित संशोधनों का समर्थन नहीं करेंगे।
सादुल्ला ने नवंबर 1948 में चर्चा के दौरान कहा था, "मैं हमारे संविधान निर्माताओं, मेरा तात्पर्य संविधान सभा से है, को इस बात से रोकना नहीं चाहता, कि यदि वे खुलकर कहें: 'यह हमारे धर्म का हिस्सा है। गाय को वध से बचाया जाना चाहिए और इसलिए हम चाहते हैं कि इसका प्रावधान या तो मौलिक अधिकारों में हो या नीति निर्देशक सिद्धांतों में'।"
पंडित ठाकुर दास भार्गव द्वारा प्रस्तावित एक संशोधन पर विचार करने के लिए हुई चर्चा में कहा गया था, "राज्य आधुनिक और वैज्ञानिक तर्ज पर कृषि और पशुपालन को संगठित करने का प्रयास करेगा और विशेष रूप से मवेशियों की नस्लों के संरक्षण और सुधार के लिए कदम उठाएगा तथा गाय और अन्य उपयोगी मवेशियों, विशेष रूप से दुधारू और भार ढोने वाले मवेशियों और उनके बछड़ों के वध पर रोक लगाएगा।"
सेठ गोविंद दास ने भार्गव द्वारा प्रस्तावित संशोधन में संशोधन प्रस्तुत करते हुए कहा कि "और अन्य उपयोगी पशु, विशेष रूप से दुधारू पशु और प्रजनन आयु के पशु, युवा पशु और भार ढोने वाले पशु" शब्दों को हटाकर अंत में निम्नलिखित जोड़ा जाए - "गाय शब्द में बैल, बछड़े और गाय प्रजाति के युवा पशु शामिल हैं"।
चर्चा के दौरान, सादुल्ला ने कहा कि यह कहना गलत है कि मुसलमान अपने हिंदू मित्रों को अपमानित करने के लिए या किसी अन्य उद्देश्य से गायों को मारते हैं।
उन्होंने कहा, "आप सही समझे या गलत, मुसलमान मांसाहारी होते हैं। बकरे के मांस की कीमत इतनी अधिक है कि कई गरीब लोग इसे खरीद नहीं सकते। इसलिए, कभी-कभार उन्हें गोमांस का इस्तेमाल करना पड़ता है। मेरी जानकारी के अनुसार, केवल अशक्त गायों को ही कसाईखाने भेजा जाता है।"
उन्होंने कहा, "असम की बात करें तो इस मामले में पहाड़ी लोग ही सबसे बड़े दोषी हैं। शिलांग में गोमांस बेचने वाले पहाड़ी लोगों के 70 कसाइयों के मुकाबले सिर्फ एक मुस्लिम कसाई है... आर्थिक मोर्चे पर मैं पंडित भार्गव द्वारा लाए गए प्रस्ताव का समर्थन नहीं कर सकता। मुझे खेद है कि पहले बताए गए कारणों से मैं सेठ गोविंद दास के संशोधन का विरोध करने के लिए विवश हूं।"
मुस्लिम लीग के जेड.एच. लारी ने कहा था कि वे उन लोगों की भावनाओं की सराहना करते हैं जो गायों की सुरक्षा चाहते हैं - चाहे वह धार्मिक आधार पर हो या इस देश में कृषि के हित में हो।
उन्होंने कहा था, "मैं यहां किसी भी संशोधन का विरोध या समर्थन करने नहीं आया हूं, बल्कि सदन से अनुरोध करने आया हूं कि वह स्थिति को बिल्कुल स्पष्ट करे और मामले को किसी भी अस्पष्टता या संदेह में न छोड़े।"
लारी ने कहा था, "साथ ही, सदन को इस बात की भी सराहना करनी चाहिए कि भारत के मुसलमान यह मानते हैं कि राज्य के शासी सिद्धांत के तहत बिना उनका उल्लंघन किये वे बकरीद के अवसर पर गायों और अन्य जानवरों की कुर्बानी देते रहे हैं और अब भी देते हैं।"
लारी ने कहा कि बहुमत को ही इस बारे में फैसला करना है।
उन्होंने कहा, "हम यहां बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अपनाए जाने वाले दृष्टिकोण को बाधित करने के लिए नहीं हैं। लेकिन मुस्लिम जनता के मन में यह धारणा नहीं रहनी चाहिए कि वे कुछ और कर सकते हैं, जबकि वास्तव में उनसे ऐसा करने की अपेक्षा नहीं की जाती है।"
उन्होंने कहा, इसलिए, यदि सदन की राय है कि गायों की कुर्बानी पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, तो इसे स्पष्ट, निश्चित और असंदिग्ध शब्दों में प्रतिबंधित किया जाए।
लारी ने कहा, "...इस सदन के समक्ष मेरा निवेदन यह है कि मौलिक अधिकारों में एक खंड को शामिल करना बेहतर होगा जिसमें गोहत्या को अब से निषिद्ध घोषित किया जाए, बजाय इसके कि इसे नीति निर्देशक सिद्धांतों में अस्पष्ट छोड़ दिया जाए, जिससे प्रांतीय सरकारों को इसे किसी भी तरह से अपनाने की छूट मिल जाए।"
चर्चा के दौरान, संशोधन पेश करने वाले भार्गव ने कहा कि वह नहीं चाहते कि मौलिक अधिकारों में इसे शामिल किए जाने के कारण गैर-हिंदू इस बात की शिकायत करें कि उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी चीज को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया है।
भार्गव ने कहा, "व्यावहारिक प्रश्न के संबंध में, मेरी राय में, यदि संशोधन की भावना को ईमानदारी से लागू किया जाता है, तो इस संशोधन को कहीं भी रखा जाए, कोई अंतर नहीं होगा।"
भाषा प्रशांत माधव
माधव
माधव
2705 1757 दिल्ली