पश्चिमबंग दिवस: राज्य के गठन, पहचान और इतिहास पर छिड़ी नयी बहस
अविनाश
- 20 Jun 2026, 09:23 PM
- Updated: 09:23 PM
(प्रदीप्त तापदार)
कोलकाता, 20 जून (भाषा) पश्चिम बंगाल के विधि निर्माताओं द्वारा भारत में शामिल होने के पक्ष में मतदान करने और इस तरह राज्य की स्थापना का रास्ता साफ होने के लगभग 79 साल बाद, 20 जून एक बार फिर अहम राजनीतिक प्रतीक के तौर पर उभरा है। इसने विभाजन, पहचान और ऐतिहासिक यादों से जुड़ी पुरानी बहसों को फिर से ताजा कर दिया है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार पहली बार इस तारीख को पूरे राज्य में आधिकारिक समारोहों के साथ 'पश्चिमबंग दिवस' मना रही है, इसलिए यह आयोजन एक भूले-बिसरे दिन से बदलकर व्यापक अर्थ में राजनीतिक प्रतीक बन गया है। इसने इस बात पर एक नयी बहस छेड़ दी है कि बंगाल अपनी स्थापना को कैसे याद रखता है और अपनी पहचान को कैसे परिभाषित करता है।
ज्यादातर राज्यों के स्थापना दिवस भाषाई आकांक्षाओं या प्रशासनिक पुनर्गठन की याद दिलाते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल की स्थापना बंटवारे, सांप्रदायिक हिंसा और बड़े पैमाने पर पलायन के उथल-पुथल भरे माहौल में हुई थी। लंबे समय तक सार्वजनिक चर्चाओं में हाशिये पर रहे इतिहास के इस अवलोकन को अब भाजपा के अंतर्गत नया राजनीतिक महत्व मिला है; क्योंकि यह पार्टी 20 जून को इस राज्य की यात्रा के एक अहम मोड़ के तौर पर देखती है।
भाजपा के लिए यह दिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व वाले उस अभियान का प्रतीक है, जिसके कारण आखिरकार राज्य का गठन हुआ। हालांकि, इसके आलोचक इस दिन को मनाने को एक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया को आज की विचारधारा के नजरिये से फिर से समझने या पेश करने की कोशिश के तौर पर देखते हैं।
बीस जून का महत्व 1947 की उन घटनाओं से जुड़ा है, जब अविभाजित बंगाल के पश्चिमी जिलों के विधि निर्माताओं ने बंटवारे और भारत में शामिल होने के पक्ष में वोट दिया था। यह एक ऐसा फ़ैसला था, जिसने आजादी के बाद अस्तित्व में आए इस राज्य की नींव रखी।
फिर भी, पश्चिमबंग दिवस को लेकर बहस अब सिर्फ़ इतिहास तक सीमित नहीं है। इसके मूल में एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई है कि बंगाल की स्थापना को कैसे याद किया जाए, उसकी पहचान क्या है, और उसकी स्थापना की कहानी कौन सुनाएगा।
भाजपा सांसद राहुल सिन्हा ने कहा, ''कांग्रेस, माकपा और तृणमूल कांग्रेस ने जान-बूझकर इस इतिहास को छिपाकर रखा, क्योंकि इससे पश्चिम बंगाल की स्थापना के पीछे श्यामा प्रसाद मुखर्जी और राष्ट्रवादी आंदोलन की भूमिका सामने आ जाती।''
इतिहासकार अक्सर 1906 के 'शिमला डेपुटेशन' को अहम मोड़ मानते हैं, जब आगा खान के नेतृत्व में मुस्लिम नेताओं ने वायसराय लॉर्ड मिंटो से अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग की थी। बाद में इस मांग को 1909 के 'इंडियन काउंसिल्स एक्ट' में शामिल कर लिया गया, जिससे औपनिवेशिक राजनीति में संप्रदाय से संबंधित प्रतिनिधित्व की व्यवस्था जुड़ गई।
उसी वर्ष के उत्तरार्ध में ढाका में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का गठन और उसके बाद सांप्रदायिक राजनीति के बढ़ते प्रभाव ने धीरे-धीरे बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया। चालीस के दशक तक, पाकिस्तान आंदोलन ने गति पकड़ ली थी, विशेष रूप से बंगाल जैसे मुस्लिम-बहुल प्रांतों में।
अगस्त 1946 में मुस्लिम लीग के 'डायरेक्ट एक्शन डे' (प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस) के आह्वान के बाद भड़की सांप्रदायिक हिंसा और उसी वर्ष के अंत में हुए नोआखली दंगों ने बंगाल में राजनीतिक विचारधारा को गहराई से प्रभावित किया।
इसी पृष्ठभूमि में 'बंगाली हिंदू जन्मभूमि आंदोलन' का नेतृत्व कर रहे तत्कालीन हिंदू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बंगाल के विभाजन के मुख्य पैरोकार बनकर उभरे।
उन्होंने तर्क दिया कि यदि भारत का विभाजन होना ही है, तो प्रांत के हिंदू-बहुल पश्चिमी जिलों को भारत के भीतर ही रहना चाहिए।
उन्होंने शरत चंद्र बोस और हुसैन शहीद सुहरावर्दी जैसे नेताओं द्वारा समर्थित एक संप्रभु और अखंड बंगाल के प्रस्तावों का कड़ा विरोध किया।
वह निर्णायक क्षण 20 जून 1947 को आया। एक संयुक्त बैठक में विधि निर्माताओं ने संयुक्त बंगाल के पक्ष में 21 के मुकाबले 58 मत दिये, लेकिन पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के प्रतिनिधियों की अलग-अलग बैठकों के बिल्कुल विपरीत परिणाम सामने आए।
पश्चिमी बंगाल के विधि निर्माताओं ने विभाजन और भारत में शामिल होने के पक्ष में मतदान किया, जबकि पूर्वी बंगाल के विधि निर्माताओं ने पाकिस्तान में शामिल होने के लिए मतदान किया।
उन मतों ने पश्चिम बंगाल और पूर्वी बंगाल के जन्म का मार्ग प्रशस्त किया, जिसमें से पूर्वी बंगाल बाद में पूर्वी पाकिस्तान बना और फिर 1971 में बांग्लादेश के रूप में अलग राष्ट्र बना।
इसके ऐतिहासिक महत्व के बावजूद, स्वतंत्रता के बाद 20 जून को कभी भी आधिकारिक प्रमुखता नहीं मिली।
बाद में कांग्रेस, वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस सरकारों ने इस तारीख को एक प्रमुख राज्य उत्सव के रूप में संस्थागत रूप नहीं दिया।
राजनीतिक वैज्ञानिक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, ''स्वतंत्रता के बाद बंगाल की मुख्य राजनीतिक संस्कृति ने विभाजन की राजनीति के बजाय बंगाली भाषाई और सांस्कृतिक पहचान पर अधिक जोर दिया। पंजाब के विपरीत, जहां विभाजन की यादें राजनीति के केंद्र में रहीं, बंगाल का मुख्य विमर्श धीरे-धीरे धर्मनिरपेक्षता, वर्ग की राजनीति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर स्थानांतरित हो गया।''
भाषा
सुरेश अविनाश
अविनाश
2006 2123 कोलकाता