एक ही पार्टी की ओर से नेता प्रतिपक्ष के दो दावों पर विधानसभा अध्यक्ष कैसे निर्णय लें: कलकत्ता उच्च न्यायालय
शफीक
- 16 Jun 2026, 09:14 PM
- Updated: 09:14 PM
कोलकाता, 16 जून (भाषा) कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मंगलवार को सवाल उठाया कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति के संबंध में अगर एक ही राजनीतिक दल से दो अलग-अलग प्रस्ताव मिलें तो विधानसभा अध्यक्ष को कौन सी प्रक्रिया अपनानी चाहिए। पश्चिम बंगाल विधानसभा में इस तरह का विवाद पहली बार अदालत के समक्ष आया है।
तृणमूल कांग्रेस विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने कहा कि अध्यक्ष को सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी से प्रस्ताव मिलने के बाद कार्रवाई करनी होती है, लेकिन उन्हें ऐसे प्रस्तावों से पैदा होने वाले विवादों का समाधान भी कानून के अनुसार करना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने अपने नाम को अस्वीकार किए जाने और पार्टी के ही अन्य विधायक रिताब्रता बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किए जाने को चुनौती दी है।
न्यायमूर्ति राव ने पूछा कि यदि एक ही राजनीतिक दल की ओर से दो अलग-अलग प्रस्ताव प्राप्त होते हैं, तो विधानसभा अध्यक्ष का कर्तव्य क्या होगा? क्या वह स्वतः संज्ञान लेते हुए निर्णय ले सकते हैं या फिर दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देना आवश्यक होगा?
विधानसभा अध्यक्ष की ओर से पेश अधिवक्ता बिल्वदल भट्टाचार्य ने दलील दी कि पश्चिम बंगाल विधानसभा परिलब्धियां अधिनियम, 1937 के अनुसार नेता प्रतिपक्ष वही सदस्य होता है जिसे सदन में सबसे अधिक संख्या वाले विपक्षी दल के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त हो।
उन्होंने यह भी दलील दी कि यदि किसी दल का संख्याबल या उसके नेता को लेकर कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो उस मामले में अध्यक्ष का निर्णय "अंतिम और निर्णायक" होगा।
अधिवक्ता ने कहा कि पश्चिम बंगाल विधानसभा के इतिहास में यह पहला अवसर है जब नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति विवाद का विषय बनी है।
अदालत ने कहा कि मामले की सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि दो विधायकों - रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा ने कथित तौर पर विधानसभा अध्यक्ष को सूचित किया था कि प्रस्ताव पर मौजूद हस्ताक्षर उनके नहीं हैं।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या विधानसभा अध्यक्ष सबसे बड़े विपक्षी दल के प्रस्ताव को नजरअंदाज कर संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी अन्य व्यक्ति को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त कर सकते हैं।
न्यायमूर्ति राव ने टिप्पणी की कि तृणमूल कांग्रेस ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त करने के लिए एक प्रस्ताव भेजा था, लेकिन अध्यक्ष ने उस पर तत्काल कार्रवाई नहीं की।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि हस्ताक्षरों को लेकर शिकायत 27 मई को की गई थी जबकि दक्षिण कोलकाता के बालीगंज से तृणमूल कांग्रेस विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय की नियुक्ति संबंधी प्रस्ताव इससे पहले ही अध्यक्ष को भेजा जा चुका था।
पश्चिम बंगाल में 294 सदस्यीय विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 207 सीट जीतीं जबकि तृणमूल कांग्रेस को 80 सीट मिलीं और बाकी सीट दूसरों के खाते में गईं।
न्यायमूर्ति राव ने पूछा कि नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए रिताब्रता बनर्जी का नाम किसने प्रस्तावित किया था क्योंकि यह प्रस्ताव किसी राजनीतिक दल की ओर से ही आना चाहिए।
न्यायमूर्ति राव ने यह भी पूछा कि क्या विधानसभा अध्यक्ष बहुमत वाले विपक्षी दल के प्रस्ताव को नजरअंदाज कर मामले में संबंधित पक्षों को सुने बिना किसी अन्य व्यक्ति को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त कर सकते हैं।
राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता भट्टाचार्य ने अदालत के समक्ष कहा कि मुख्य प्रश्न यह है कि क्या शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त करने की सिफारिश को वैध माना जा सकता है।
उन्होंने कहा कि दावा किया गया था कि तृणमूल कांग्रेस ने नौ मई को यह प्रस्ताव पारित किया था जिसके बाद विधानसभा अध्यक्ष के कार्यालय ने बैठक का ब्योरा मांगा था।
भाषा सुरभि शफीक
शफीक
1606 2114 कोलकाता