फिच रेटिंग्स ने भारत का वृद्धि अनुमान घटाकर 6.4 प्रतिशत किया
प्रेम
- 09 Jun 2026, 10:59 AM
- Updated: 10:59 AM
नयी दिल्ली, नौ जून (भाषा) फिच रेटिंग्स ने मंगलवार को चालू वित्त वर्ष के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के वृद्धि दर अनुमान को 6.7 प्रतिशत से घटाकर 6.4 प्रतिशत कर दिया। अमेरिका-ईरान संघर्ष और इससे जुड़े तेल संकट के प्रभावों की वजह से यह कटौती की गई है।
रेटिंग एजेंसी फिच ने जून महीने की अपनी वैश्विक आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट में कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर धीमी रह सकती है लेकिन घरेलू मांग और निवेश से कुछ समर्थन मिलेगा।
फिच रेटिंग्स ने कहा, "हम उम्मीद करते हैं कि वित्त वर्ष 2026-27 में जीडीपी वृद्धि दर घटकर 6.4 प्रतिशत रह जाएगी, जो मार्च के अनुमान से 0.3 प्रतिशत अंक कम है। घरेलू मांग वृद्धि का मुख्य आधार बनी रहेगी और वास्तविक संदर्भ में आयात कम होने से शुद्ध बाहरी मांग इस वृद्धि में सकारात्मक योगदान देगी।"
रिपोर्ट के मुताबिक, उच्च मुद्रास्फीति और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से वास्तविक आय पर दबाव बढ़ेगा, जिससे उपभोक्ता खर्च प्रभावित होगा। यह प्रभाव विशेष रूप से वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी एवं तीसरी तिमाही में अधिक दिखाई देगा।
रेटिंग एजेंसी ने कहा कि अमेरिका-ईरान युद्ध की वजह से वैश्विक तेल कीमतों में तेजी आई है और इसका असर भारत सहित वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
फिच ने ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत के अनुमान को बढ़ाकर 87 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है, जो पहले 70 डॉलर प्रति बैरल था।
इसके साथ ही पश्चिम एशिया संघर्ष की वजह से 14 सप्ताह से बंद होर्मुज जलडमरूमध्य के जुलाई तक बंद रहने का ही अनुमान लगाया गया है।
फिच रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री ब्रायन कोल्टन ने कहा, "तेल की कीमतों में तेजी से वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर दबाव पड़ रहा है और जोखिम बढ़ रहे हैं। लेकिन दुनिया भर में आईटी पर खर्च तेजी से बढ़ रहा है, जो निकट अवधि में आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक असर को कुछ हद तक कम कर रहा है।"
हालांकि यह रिपोर्ट कहती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका असर 1970 के दशक जैसे गंभीर तेल संकट की तुलना में कम होगा, क्योंकि आज ऊर्जा की वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी कम हो गई है।
रेटिंग एजेंसी ने कहा कि इस संकट के बावजूद भारत में मुद्रास्फीति अभी अधिक नहीं बढ़ी है, लेकिन इस पर दबाव बढ़ रहा है। अप्रैल में थोक मुद्रास्फीति 8.3 प्रतिशत और खुदरा मुद्रास्फीति 3.5 प्रतिशत रही।
फिच ने अनुमान जताया कि साल के अंत तक मुद्रास्फीति बढ़कर 5.3 प्रतिशत तक जा सकती है। इसका कारण ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी, आधार प्रभाव और संभावित कमजोर मानसून है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भले ही रेपो रेट को फिलहाल 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखा है लेकिन बढ़ते महंगाई दबाव के चलते इस साल ब्याज दरों में एक बार बढ़ोतरी कर इसे 5.5 प्रतिशत किया जा सकता है।
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत पर फिच ने कहा कि रुपये में बड़ी गिरावट की संभावना सीमित है और यह चालू वित्त वर्ष में औसतन 97.50 प्रति डॉलर के स्तर पर रह सकता है।
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